Wednesday, 4 November 2020

जे चेत जाई ऊ चन्दन हो जाई।


 आज दिनांक 04/11/2020को करवाचौथ पर सुहागिनों को आशीर्वाद देने के बाद श्री स्वामी धर्मात्मानन्द जी महाराज ने समाधि मंदिर निर्माण का प्रस्ताव रखा।

उन्होंने कहा कि अब मुझे किसी से ममता नहीं है।न ही किसी की चिंता है। मैंने कहा यह लक्षण ठीक नहीं है  क्योंकि जब मुझे किसी से मतलब ही नहीं है तो मैं यहां क्यों रुकूंगा। महाराज जी ने कहा पहले गंजेडियों का जमाना था उसके बाद मेरा जमाना हुआ अब आगे देखो किसक जमाना आता है। मैंने कहा चाहे जिसका जमाना आए लेकिन हमें नंगली और सद्गुरु नगर की बाई जी की तरह यह ना कहना पड़े कि हमने इतनी सेवा किया, हमें महाराज जी ने कुछ नहीं दिया।

श्री स्वामी जी ने कहा कोई किसी को देता नहीं है जिसका जितनी सेवा भक्ति रहती है उसके पास उतनी चली जाती है, जो जितना करेगा उतना पा लेगा। लोग सोचते हैं दो-चार दिन सेवा करके पा जाएंगे ऐसा नहीं होता है जो कसौटी पर खरा उतरता है उसे ही दिव्यप्रकाश की प्राप्ति होती है।

राजकुमार ने कहा सब चंदन तो कोयला हो गया अब क्या होगा ? श्री स्वामी जी ने कहा "जे चेत जाई ऊ चन्दन हो जाई।""

श्री स्वामी जी ने कहा मुझे भोजन नहीं मिल रहा है उनके कहने का तात्पर्य है की आत्मा का भोजन भजन है और कोई भक्त भजन नहीं कर रहा है इसलिए उन्हें भाव और भजन का भोजन नहीं मिल रहा है। एक बार फिर राजकुमार ने कहा यह जो पूजा हो रही थी करवा चौथ की क्या वह भजन नहीं है? महाराज जी ने कहा; नहीं, यह देखउआ है।

महाराज जी ने राजकुमार से कहा मेरे ना रहने पर देखना कोई सारनाथ की जमीन बेचने ना पाए। मेरी इच्छा थी की सारनाथ आश्रम पर केवल बाई जी लोग रहेंगी। लेकिन कोई तेजतर्रार नहीं है।

मुझे कोई चिंता नहीं है जेकर चूई ऊ छाई।

महाराज जी ने एकता ना होने पर हार्दिक खेद प्रकट किया।

मैंने जो यह कहा था कि हमें यह ना कहना पड़े कि महाराज जी ने हमें कुछ नहीं दिया उसका आशय यह था कि अब जब आप नहीं हो तो मुझे किसी का पिछलग्गू न बनना पड़े। लेकिन महाराज जी ने उसका कोई सीधा जवाब नहीं दिया उन्होंने बस इतना ही कहाकी जिसके हिस्से में जितना रहेगा कमाई के हिसाब से उतना चला जाएगा।

हमारे लिए यह एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर रह गया है की आप के ना रहने पर हमारा क्या होगा हम क्या करेंगे क्या हम किसी के पिछलग्गू ही बने रहेंगे?

महाराज जी जिसको कसौटी पर खरा उतरने की बात कह रहे थे उनका संकेत हम समझ रहे थे और यह भी समझ रहे थे की परोक्ष रूप से वह उसे ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रहे थे इसलिए हम चाहते थे कि महाराज जी हमें भी स्पष्ट निर्देश दें कि हमें आगे क्या करना है लेकिन उन्होंने तो यथेच्छसि तथा कुरु की स्थिति में ला खड़ा किया।








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