Saturday, 18 September 2021

परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर

हरियान गरुड़ ने काग भुसुण्डी जी से पूछा जब आपको इच्छा मृत्यु का वरदान मिला है तो आप शरीर क्यों धारण किए रहते हैं मोक्ष क्यों नहीं प्राप्त कर लेते? कागभुसुंडि जी ने कहा ,"तजउं न तन निज इच्छा मारना।तन बिना वेद भजन नहीं बरना।।"
कबीर ने कहा है वृक्ष कबहु नहीं फल भखै ,नदी   न संचय नीर। परमारथ के कारण साधुन धरा शरीर।।
18 सितंबर 2021की शाम को श्री स्वामी जी के शारीरिक अस्वस्थता के कारण उन्हें हेरीटेज अस्पताल वाराणसी में भर्ती करना पड़ा।
शरीर अस्वस्थ हैं।आक्सीजन लेवल कम ज्यादा हो रहा है।13सितम्बर2021को कोविशील्ड की पहली डोज लग गई थी।अब फेफड़े में संक्रमण के कारण साँस लेने में दिक्कत हो रही है।
रात में श्री स्वामी जी ने कहा"आज अगोरिहा जा।"
बाई जी, छोटे लाल, राजकुमार और मैं हेरीटेज अस्पताल के उस कक्ष में बारी बारी से जागने के लिए उपलब्ध हैं। ड्राइवर बाबा और गुलाब द्वय नीचे प्रतीक्षालय में मौजूद हैं।भोर में ४/१५पर बाई जी राजकुमार से कहती हैं कि अब आप जगह दीजिए संदीप भगत रात भर नहीं सोये हैं वे हो लें नहीं तो उनका शुगर बढ़ जाएगा। राजकुमार कहते हैं रोज़ सुतबय न करय लँ,एक दिन नहिंयय सुतीहँय तऽ का हो जाई। फिर मुझसे कहते हैं, चलिए सारनाथ चला जाय,इन लोगों को खाना भी भिजवा दिया जाएगा और आप भी आराम कर लेंगे। राधिका बाईऔर शांति मावा ने खाना बनाया और आनंद तथा गुरुदयाल लेकर गए।ज्योति ने पूछा"बाई जी कह रही हैं कि पिंकी अकेली है, तूं भी आ जा,का करीं ,आईं?"
मैंने कहा"आ जा।"

मैं एक रतजगा की सेवा से ही कृतार्थ अनुभव कर रहा हूं।सब अपने हिस्से की सेवा कर धन्य हों।
नाथ सकल संपदा तुम्हारी।
मैं सेवक समेत सुत नारी।।
सभी गुरुभ्राताओं की यह भावना रहती है-
मैं सेवक गुरु पद,पद मोरा।
अस अभिमान जाय नहिं भोरा।।

Saturday, 11 September 2021

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। -----------------विमलानन्द बाई जी 11/09/21

आज दिनांक 11/09/21को राजकुमार पंच प्यारे का चयन करना चाहते थे। पहले वह श्री स्वामी जी से पांच समर्पित भक्तों के चुनाव के लिए कह रहे थे जो जरूरत पड़ने पर अपनी किडनी दान कर सकें।श्रीस्वामी जी ने कहा मालिक एही के ठीक कर दें बच्चू,हम केहू के ना कहब।
राजकुमार ने बाई जी से चुनने को कहा तो उन्होंने कहा यह तो मालिक न बताएंगे कि मैं कैसे बताऊं? मैंने कहा आप मेरा, राजकुमार या किसी अन्य का का नाम नहीं ले सकतीं यहां तक तो ठीक है लेकिन आप पूछने पर अपना नाम तो आगे कर सकती थीं? उन्होंने कवई काटते हुए कहा मैं देना चाह कर भी क्या करूंगी लेने वाला स्वीकार करेगा तब न! मैंने कहा यह तो बाद की बात है पहले आपको अपना नाम तो आगे करना चाहिए था। उन्होंने कहा यह बात पहले ही हो चुकी है उनका इशारा था कि महाराज जी उनके नाम का प्रस्ताव रिजेक्ट कर चुके हैं।
फिर उन्होंने कहा एक गाना में कहते हैं न कि
वक्त आने दे तुझे,,,,,,,,,,,,हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है,,,,,,,,,,, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।
मैं विस्मिल की पंक्तियां दुहराता हूं
उन्होने "देेखना है जोर कितना बाजुए कातिल में हैै"
इस ठसक से कहा कि उनका अति आत्मविश्वास अहं की सीमा को छूता हुआ अनुभव हुआ।
इस पूरी कवायद में एक सोची समझी रणनीति की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
मैंने राजकुमार से पूछा कि महाराज जी परीक्षा लेना चाहें तो उनका अधिकार है उस पर कोई बस नहीं लेकिन आप क्यों भक्तों की परीक्षा लेना चाहते हैं? उन्होंने कहा मैं परीक्षा नहीं ले रहा हूं मैं चाहता हूं कि अब जब महाराज जी दिल्ली जायं तो पांच लोग मेरे पीछे रहें ताकि जरूरत पड़ने पर वह तन मन से उपलब्ध रहें।
तो गुरु भाइयों और बहनों वक्त की नजाकत को समझते हुए तैयार रहें।
मालिक सबका मंगल करें।