Wednesday, 24 March 2021
Friday, 19 March 2021
गुरु चरणामम्बुज निर्भर भक्त ः
अति आनंद उमगि अनुरागा।चरन सरोज पखारन लागा।।
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी।सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।
महाशिवरात्रि पर गुरु-शिष्य
गुरु के बचन प्रतीति न जेही।सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।
तजउँ न नारद कर उपदेसू।आपु कहहिं सत बार महेसू।।
नारद बचन न मैं परिहरऊँ।बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।
गुरु हमारे बानियां कि सूखी भौंरी देंय।
नमक मिर्च मांगूँ नहीं कि ईह़ो जिन ले लेंय।।
रज़ा पर राजी रहने वाले इसी तरह सोचते हैं।
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।
निज कर कमल परसि मम सीसा।हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।।
राम भगति अविरल उर तोरें।बसिहि सदा प्रसाद अब मबिलोकनि
मामवयलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।
सुकृति संभु तन विमल विभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी।किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
श्रीगुर पद नख मनि गन ज्य़ोति।सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती।।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।नयन अमिय दृग दोष विभंजन।।
Wednesday, 17 March 2021
धर्मों रक्षति रक्षतः
महात्मा बैरागानंद जी के साथ सतगुरुसेवानन्दरृ््््ं््््््््ं्रृ्
श्री स्वामी धर्मात्मानन्द जी महाराज परमहंस के शिष्य
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| संदीप, संजय,छ़ोटेलाल , महाराज जी के साथ |
Sunday, 14 March 2021
Saturday, 13 March 2021
जे दुसरे कऽ सुनी ऊ पिछड़ जाई
महाशिवरात्रि पर्व पर गुरूंशंकररूपिणम् का स्नेहिल आशीर्वाद प्राप्त हुआ। इस अवसर पर महाराज जी ने कहा"हम दू आंंख ना करीला।
जे दुसरे कऽ सुनी ऊ पिछड़ जाई।"
गद्दी गद्दा और गद्दार
गद्दी वह आसन है जिस पर महाराज बैठते हैं। गद्दी विजय से मिलती है। माया का किला जीतने वाले को मिलती है- गद्दी। गद्दी उस निर्भय पद की संज्ञा है जिसे शंकर "लभेद्वांछितार्थं पदं ब्रह्म संज्ञं"से अभिहित करते हैं। संत जिसे अमरपद, परमपद, अविनाशी पद कहते आये हैं। वह गद्दी उसे ही मिलती है जो माया का महल जीत लेने का सत् साहस और धैर्य रखते हैं। श्री भोले बाबा कहते हैं
तू कष्ट से घबरा न जा रे कष्ट ही सुख मान रे।
जो कार्य नहीं हो सिद्ध तो भी लाभ उसमें जान रे।
बहू बार पटकें खाय हैं, तब मल्ल मल्लन पीटता।
लड़ता रहे जो धैर्य से माया किला सो जीतता।।
कृष्ण कहते हैं"मामऽनुस्मर युद्धय च"अर्थात सुमिरन करते हुए युद्ध करो। तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चय:/हे कुंती पुत्र इसलिए उठो और युद्ध का निश्चय करो। वेदांत के मर्मज्ञ बाबा कहते हैं
यदि कष्ट से घबराई के तू युद्ध से हट जाएगा
तो तू जहां पर जाएगा बहु भांति कष्ट उठाएगा
जन्मे कहीं भी जाकर नहीं मुफ्त होगा युद्ध से
रहा युद्ध करता धैर्य से जब तक मिले नहीं शुद्ध से।।
अर्थात परम पावन पद जब तक मिल नहीं जाता तब तक धैर्य पूर्वक मन माया से युद्ध में निरत रहना ही एकमात्र कर्तव्य है। इस महायुद्ध के लिए ललकारते हुए निर्भयानंद कहते हैं-
गोला मारे ज्ञान का संत सिपाही कोय।
उत्कट जिज्ञासु बनै,अजब उजाला होय।।
अजब उजाला होय, अंधेरा सब ही नासै।
अंतरमुख हो लखै,आतमा अपना भासै।।
कहैं निर्भयानंद होय जिज्ञासु भोला
संत सिपाही कोय ज्ञान का मारे गोला।।
गद्दी किसे ? राजा को। और राजा कौन? उसके गुण और लक्षण-
राज कि रहा नीति बिनु जाने? और निति क्या?
वह राजा सो यह विधि जानै
काया नगर जीतिबो ठानै।
काम क्रोध दोउ बल के पूरे
मोह लोभ अति साँवत सूरे
बल अपनो अभिमान दिखावै
इनको मारि राह गढ़ धावै
पाँचो प्यादे देहि उठाई
जब गढ़ में कूदै मन लाई
ज्ञान खड्ग ले दुंद मचावै
कपट कुटिलता रहै न पावै
चुनि-चुनि दुरजन हनि सब डारै
रहते सहते सकल विडारै
मन सूँ ब्रह्म होय गति सोई
लच्छन जीव रहै नहिं कोई।।
संत मत के पूर्ववर्ती गुरु गोरखनाथ ने दम के दम से गद्दी तक पहुंचना सिखाया है।
अरध उरध धरि बिचि उठाई
मधि सुंनिं में बैठा जाई
मतवाला की संगति आई।
कथंत गोरषना परमगति पाई।
श्वासा को अरध माने नीचे उरध माने ऊपर को बीच में ही पकड़ कर ब्रह्मरंध्र में जा बैठा। मतवाला (गुरूंशंकररूपिणम्)की संगति मिली इसप्रकार हमें परमगति (गद्दी) मिली।
गोरख तो उसे ही फ़कीर,साधु, दरवेश समझते हैं जो दर अर्थात गद्दी को जानता है।
दर की जानता है अर्थात जानता है कि मालिक सहस्रदल कमल की गद्दी पर बैठे हुए हैं।पवन अर्थात श्वासा़ के भजन से पंच इन्द्रियों को अपने वश में रखता हुआ सावधान रहता है। ऐसा दरवेश ब्रह्मस्वरूप है, अल्ल्लाह की जाति है।
गद्दी गर्भ को (आवागमन को) छुड़ाने वाली है। नासिका जहां से प्राऱंभ होती है वह स्थान है भ्रूम़ंडल, भृकुटी। वहाँ की बैठक भी दूध-मूत के भव को पार कर देती है। गोरख माता का दूध न पीने को ,थिर रहनी को गद्दी पर बैठा हुआ समझते हैं-
नासिका अग्रे भ्रू मंडले
अहनिस रहबा थीरं
माता गरभ जनम न अयबा
बहुरि न पियबा षीरं।।
गद्दी मिल जाए तो-
अचल सिंहासन जब तू पावै
मुक्ति खवासी चँवर ढुरावै
आठों सिद्धि जहाँ कर जोरैं
सौं ही ताकैं मुख नहिं मोरैं
निस्चल राज अमल करै पूरा
बाजै नौबत अनहद तूरा
तीन देव अरु कोटि अठासी
वै सब तेरी करैं खवासी
गुरु सुकदेव भेद दिये नीको
चरनदास मस्तक कियो टीको।।
रनजीता यह रहनी पावै।
थोथी करनी कथनि बहावै।।
चरनदास जी सत् के सिंहासन पर विराजमान हो जाने की युक्ति बताते हुए कहते हैं कि-
जो नर इकछत भूप कहावै।
सत्त सिंहासन ऊपर बैठे जत ही चँवर ढुरावै।।
दया धरम दोउ फौज महा ले भक्ति निसान चलावै।
पुन्न नगारा नौबत बाजै दुरजन सकल हलावै।।
पाप जलाय करै चौगाना हिंसा कुबुधि नसावै।
मोह मुकद्दम काढ़ मुलुक सूँ ला बैराग बसावै।।
साधन नायब जित तित भेजै दै दै संजम साथा।
राम दोहाई सिगरै फेरै कोइ न उठावै माथा।।
निरभय राज करै निस्चल ह्वै गुरु सुकदेव सुनावैं।
चरनदास निस्चै करि जानौ बिरला जन कोइ पावै।।
गद्दी का हिसाब
गद्दी का हिसाब है मन भर।
गद्दी तो है अ-मन।
लेकिन हिसाब है मन भर।
मन का भार कितना?
यहु मन सकति यहु मन सीव
यहु मन पाँच तत्व का जीव
यहु मन ले जे उन्मन रहै
तौ तीन लोक की बातां कहै।।
जिसने मन को उन्मन (उन मन अर्थात उनके मन)से तौलकर उनको दे दिया उसने ही हिसाब दिया,वह साह+(शाह)है बाकी तो चोर हैं।
कबीर ने हिसाब समझाया-
मन से मन को तौलिए
दो मन कभी न होय ।
कहैं कबीर मन मनहिं मिलावा।
अमर भये सुख सागर पावा।।
जिसने मन भर का हिसाब दिया वह सुख सागर का अधिकारी होकर अमर है क्योंकि अमन अमृत है, उसने मन तौलकर अमृत पा लिया।
मन भर हिसाब देने का मन नहीं करता है तो गद्दी कहती है पवन(श्वांस)का ही हिसाब दो-
ये दम हीरा लाल हैं गिन गिन गुरु को सौंप।।
कहती हूं कही जाती हूं, कहूं बजाऊं ढोल।
श्वांसा खाली जात है तीन लोक का मोल।।
साँस का मोल भी मन से कम नहीं है।मन से मन तौलने में गाढ़ गुजरता हो तो दम ही तौल-
दादू ऐसे मँहगे मोल का,एक सांस जो जाइ।
चौदह लोक समान हो,काहें रेत मिलाइ।।
एक सांस भी बिना तोल के निकली तो चौदह लोक का मोल भी उससे तुलनीय नहीं है-बालू में गया।
झटका मार,एक बार में सिर ही सौंप दे !क्या मन पवन का हिसाब!
जे सिर सोंप्या राम को,सो सिर भया सनाथ।
दादू दे उऋण भया, जिसका तिसके हाथ।।
इतना दम नहीं है तो कम से कम दमड़ी-चमड़ी (दान और सेवा)तो देना ही होगा-प्रकट चार पद धर्म के कलि महँ एक प्रधान/येन केन बिधि दीन्हे दान करइ कल्यान।।
और अब नादानों (जो कुछ भी नहीं देना चाहते) के लिए-
राम नाम के पटतरे देवै को कछु नाहिं।
क्या ले गुरु संतोषिये हौंस रही मन माहिं।।
कुल तोहरय हऽ तऽ देहीं का?
तन भी तेरा मन भी तेरा, तेरा पिण्ड परान।
सब कुछ तेरा,तू है मेरा,यह दादू का ज्ञान।।
यही हिसाब चुकता।
"
गद्दा का हाल"
सुख की चाह और माया की माँग ही गद्दा है।मति को मलीन करने वाली त्रिविध ईषना ही गद्दा है। मैंने यह सुख पाया और मैं यह सुख पाऊँगा, इसका सतत चिंतन ही गद्दा है।
गद्दा की चाह न केवल गद्दी से दूरी बनाने की हेतु है यह साधु संग और भजन में भी भंग करती है।गद्दा की चाह शाह को चोर और शेर को गदहा बनाती है।धोबी का गधा गट्ठर ढोने वाला।
गद्दी के निकट पहुंचे विश्वामित्र और गद्दी पर बैठे मत्स्येन्द्रनाथ (गोरख के गुरु)भी गद्दा की गुदगुदी में गुम हो गए। और गुदगुदी ऐसी कि जब तक कोई गड़ने चुभने का सम्यक बोध न कराये तब तक वह कंटकाकीर्ण गद्दा छोड़ने का मन नहीं हो।
रूई का गद्दा छूट भी जाय दुई का गद्दा तो वृद्ध राजा ययाति भी नहीं छोड़ता, पुत्र का यौवन उधार लेता है और लोकनिंदा सहता है।
गोरख ने अपने सद्गुरु की गद्दासक्ति मिटाने के लिए भदेस भद्दा शब्दों का जमकर सार्थक उपयोग किया है। गोरख से पहले और बाद गुरु ही शिष्य को गद्दा से बचने को चेताते रहे यहां शिष्य गुरु से बोला
चामै चाम घसंता आलिंगन चूबतां
दिन दिन छीजै काया
आपा परचै गुरुमुख न चीन्हे
फाड़ि फाड़ि बाघिनी खाया।।
बाघनी उपाया बाघनी निपाया बाघनी पाली काया
बाधनी डकरै जौरियो पखरै अनुभइ गौरख राया
रूपे रूपे कुरूपे गुरुदेव बाघनी भोले भोले
जिन जननी संसार दिखाया ताको ले सूतै षोलै।
दीपक जोति पतंग गुरुदेव ऐसी भग की छाया
बूढ़े होइ तुम्हें राज कमाया नां तजी मोह माया।
बदंत गोरखनाथ सुनहु मछंदर तुम्ह ईश्वर के पूता
ब्रह्म झरंता जे नर राखै सो बोलो अवधूता।।
गुरु जी ऐसा करम न कीजै।
ताथैं अमी महारस छीजै।
दिवसै बाघिणि मन मोहै राति सरोवर सोखै।
जानि बूझि ले मूरख लोया घरि घरि बाघणि पोषै।
नदी तीरे बिरछा नारी संगे पुरुषा अलप जीवन की आसा।
मनथैं उपज मेर षिसि पड़ई तातैं कंध विनाशा।।
गुरु जी!ऐसा कर्म न कीजिए जिससे महारस अमृत क्षीण होता है।
गोड़ भए डगमग पेट भया ढीला सिर बगुला की पंखिया।
अमीं महारस बाघिनी सोष्या घोर मथन जैसी अंखियां।।
भोगिया सूतै अजहूं न जागै
भोग नहीं रे रोग अभागे।
भोगिया कहै भल भोग हमारा
मनसइ नारि किया तन छारा।
एक बूंद नर नारी रीधा
ताही में सीध साधक सीधा।।
भोगी कहते हैं हमारा भोग अच्छा है।मनसना इच्छा करके उन्होंने अपना शरीर भस्म कर डाला।इसी एक बूंद के आनंद में नर नारी पच मरे और उसी को साधना से सिद्ध कर साधकों ने सिद्धि प्राप्त की।
क्य़ोंकि योग और भोग दोनों ही अग्नि है। योगाग्नि तथा कामाग्नि।जो अग्नि के भेद को जानता है वह गद्दी और गद्दा के रहस्य को समझता है।वह आप ही आत्मस्वरूप को जान जाता है।
अगनि ही जोग,अगनि ही भोग।
अगनि ही हरै चौंसठ रोग।।
जो इहि अगनि का जानै भेव।
सो आप ही कर्ता आप ही देव।।
लेकिन गुदगर गद्दा की चाह ने आदमी को मदारी का बंदर बना रखा है
नारि विवश नर सकल गोसाईं।
नाचहिं नट मरकट की नाईं।।
कामी का गुरु कामिनी,लोभी का गुरु दाम।
कबीर का गुरु सन्त हैं,सन्तन का गुरु नाम।।
गद्दा मांगने वाले को साधु की गारी है-
जुगन जुगन समुझावत हारा,कहा न मानै कोई रे
तू तो रंडी फिरै बिहंडी, सब धन डारा खोई रे।।
जिसके गद्दा पर ग्राहक जाय वह है रंडी और जो ग्राहक के गद्दा पर जाय वह है बिहंडी। इसप्रकार गद्दा की चाह में रंडी और बिहंडी बना जीव अपने मूल गद्दी (स्वरूप)को छोड़कर भटक रहा है।
रावण जैसा गद्दा न किसी को मिला न मिलेगा।
गद्दा में है चार विकार
भय निद्रा मैथुन आहार।।
भय निद्रा मैथुन आहार सबके समान जग जाये
सुर दुर्लभ तनु धरि न भजे हरि मद अभिमान गंवाये
गई न निज -पर बुद्धि सुद्ध ह्वै रहे न राम लय लाये
तुलसीदास यह अवसर बीते का पुनि के पछिताये।।
तुलसी जौं लौं विषय की मुधा माधुरी मीठी।
तौ लौं सुधा सहस्र सम राम भगति सुठि सीठी।।
स़ंतों नारि सों प्रीति न लावै।
प्रीति जो लावै आप ठगावै,मूल बहुत को गावै।
गुरु को बचन हृदय ले लावै, पांचों इन्द्री जारै।
मनहिं जीति, माया बस करिके,काम क्रोध को मारैं।
लोभ मोह ममता को त्यागै तृष्णा जीभि निवारै।
सील संतोष को आसन माड़ै निसु दिन शब्द विचारै।
जीव दया करि आप संभारै,साध संगति चित लावै।
कह गुलाल सतगुरु बलिहारी बहुरि न भवजल आवै।।
" गद्दारों की सूची"
गद्दी का हिसाब और गद्दा का हाल जान लेने पर गद्दार की पहचान आसान है।
आत्म-विस्मरण ही गद्दारी है।
तुझे याद हो कि न याद हो।
नर जन्म यह बहु काम का, तुझको दिया बे दाम का।
अब भजन उसके नाम का, तुझे याद हो कि न याद हो।
हरि के भजन बिन बेवफा, तुझको मिले न कभी नफा।
ब्रह्मानंद का कहना सफा, तुझे याद हो कि न याद हो।
जो ईश का उपकार था, तुझे याद हो कि न याद हो।
खुद्दारों की संख्या हमेशा गद्दारों से कम होती है।
गद्दारी में एक खास तरह का सुख है ठीक वैसा ही जैसा नींद और नशे में होता है इसलिए कामी क्रोधी लालची गद्दार की गाली खाकर भी इसे छोड़ना नहीं चाहता।
इस सूची में पहला स्थान-
मो सम कौन कुटिल खल खामी।
तुम सौं कहा छिपी करुणामय,सब के अंतरजामी।
जो तन दियो ताहि बिसरायो,ऐसो नमकहरामी।
भरि भरि उदर विषय को धावत जैसे सूकर ग्रामी
सुनि सत्संग होय जिय आलस वषयिनी संग विसरामी
श्रीहरि चरन छांड़ि बिमुखन की निसि दिन करत गुलामी।
पापी परम अधम अपराधी सब पतितन में नामी।
सूरदास प्रभु अधम उधारन सुनिए श्रीपति स्वामी।।
अति संक्षेप में
तेरा नाम मोक्ष धाम द्वार है
तुझसे बिमुख ही गद्दार है।।
सनमुख की सदा बहार है।
गूंजती उसकी ही जयकार है।
मनमुखी मक्कार है।
धिक्कार है,धिक्कार है।
सब जगत बीच एक तेरा नाम-रूप सार है।।
जय गद्दी
भय गद्दा
धिक् गद्दार।।






































