जो इच्छा करिहहु मन माहीं। गुरु प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।
अति आनंद उमगि अनुरागा।चरन सरोज पखारन लागा।।
अति आनंद उमगि अनुरागा।चरन सरोज पखारन लागा।।
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ।पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी।सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी।सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।
एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुरु कर कोमल सील सुभाऊ।।
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।
महाशिवरात्रि पर गुरु-शिष्य
गुरु के बचन प्रतीति न जेही।सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।
तजउँ न नारद कर उपदेसू।आपु कहहिं सत बार महेसू।।
नारद बचन न मैं परिहरऊँ।बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।
गुरु हमारे बानियां कि सूखी भौंरी देंय।
नमक मिर्च मांगूँ नहीं कि ईह़ो जिन ले लेंय।।
रज़ा पर राजी रहने वाले इसी तरह सोचते हैं।
गुरु और शिष्य की एक कहानी यह भी है-
गुरु ने कहा किन्तु चेला न माना।
गुरु को विवश हो पड़ा लौट जाना।।
गुरु जी गए रह गया किन्तु चेला।
यही सोचता हूँगा मोटा अकेला।।
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।
निज कर कमल परसि मम सीसा।हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।।
राम भगति अविरल उर तोरें।बसिहि सदा प्रसाद अब मबिलोकनि
मामवयलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।।
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा ।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
सुकृति संभु तन विमल विभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी।किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
श्रीगुर पद नख मनि गन ज्य़ोति।सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती।।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।नयन अमिय दृग दोष विभंजन।।
























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