Wednesday, 17 March 2021

धर्मों रक्षति रक्षतः

  श्री स्वामी धर्मात्मानन्द जी महाराज की सेवा में
महात्मा बैरागानंद जी के साथ सतगुरुसेवानन्दरृ््््ं््््््््ं्रृ्



 श्री स्वामी धर्मात्मानन्द जी महाराज परमहंस के शिष्य


संदीप, संजय,छ़ोटेलाल , महाराज जी के साथ

धर्म क्या है? संपूर्ण धर्म को त्याग कर केवल एक मेरी अनन्य शरण को प्राप्त हो मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा तू शौक मत कर।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्व पापेभ्य़ो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।(गीता १८-६६)
सभी धर्मों को-जिसे हम अब तक धर्म समझते आए हैं उसे छोड़कर तू मेरे में ही अनन्य मन वाला हो,मेरा अनन्य भक्त हो, मेरे प्रति श्रद्धा से पूर्ण हो, मेरे को ही नमन कर। ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा।यह मैं तेरे लिए सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि में।।
      श्रीकृष्ण की इसी सर्वगुह्यतमं परम वचन में धर्म संदेश है।इस लेख का शीर्षक है धर्मों रक्षति रक्षतः अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है तो धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्म हमारी किससे रक्षा करता है?

धर्म्यामृतमिदं (गीता १२-२०)धर्ममय अमृत का सेवन मृत्यु -भय से हमारी रक्षा करता है।
हम न मरौं मरिहैं संसारा। हमको मिला जियावन हारा।।
धर्मात्मा कौन है?
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्ति निगच्छति‌
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भ क्तः प्रणश्यति।।
अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है।इस भजन के प्रभाव से वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदैव रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता  है।

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