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| महाशिवरात्रि पर गुरु-शिष्य |
पहले जोगड़ा की बात कर लेते हैं। वैदिक हिंसा हिंसा न भवति में भारतेंदु
हरिश्चंद्र का व्यंग है
यहि असार संसार में चार वस्तु है सार।
जुआ मदिरा मांस और नारी संग विहार।।
जो इस आदर्श को मानने वाला और उसका पोषक है वही जोगड़ा है। जोगड़ा कहते हैं"
पैसा खुदा नहीं पर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं!"
जोगड़ा कहता तो जोगी जैसा ही है किंतु करता नहीं है
कहता है करता नहीं मुंह के बड़े लबार।
तिन के मुंह काला होइहैं साहब के दरबार।।
प्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर ने लिखा है
दुखों का तभी अंत होता है
जब प्राणी अंदर से संत होता है।
मोह हो न माया,
तो कैसे टिकेगा दुख का साया,
दुखों का इसीलिए अंत नहीं है
क्योंकि कोई भी तो संत नहीं है।।
जोगड़ा की एक और विलक्षण पहचान है
लंबा टीका मधुरी बानी।
दगाबाज की यही निशानी।।
जोगड़ा तो कभी-कभी असली जोगी को भी अपने कुशल नाटकीय अंदाज से बहुत पीछे छोड़
देता है। जोगड़ा आदर्श का हव्वा खड़ा करता है-
वह आदर्श का हउवा निकला
कोकिला समझा जिसे कउवा निकला
जो भी शराब के विरोध में बोला
उसके जेब से पउवा निकला।।
जोगड़ा एक विशेष बात का विशेष प्रचारक है
हाथी घूमे गाँव -गाँव
जेकर हाथी ओकर नाँव।!
100 सौ जूता खाए तमाशा घुस के देखें।
समस्त कुशलता के बाद भी जोगड़ा अंत में पहचान ही लिया जाता है--बोलत ही पहचानिए
साहू चोर की घाट/अन्तर घट की करनी निकरे मुख की बात।।आइए अब बिन्दु जी महाराज
से तोता मैना का संवाद सुनते हैं तोता एक नंबर का जोगड़ा है और मैना जोग की
उपदेशक-
मैना-अरे तेरी एक श्वांस अमोल।
रे मन तोता हरि हरि बोल।।
तोता_रसना ज्ञान कथा मत खोल ।
मैंना जग उपवन में डोल ।
रंग रंग के फूल खिले हैं ।
बड़े भाग से भोग मिले हैं ।
सुख साधन के सुफल बने हैं ।
सदानंदमय अमृत ढले हैं ।
सबके स्वाद टटोल ।
मैना जग उपवन में डोल।।
मैना-सपने में एक बाग लगाया ।
फूल फलों में मन ललचाया ।
जब छूने को हाथ बढ़ाया ।
जाग पड़ा कुछ भी नहीं पाया।
यथा ढोल में पोल ।
रे मन तोता! हरि हरि बोल।।
तोता-यदि सपना है जग उपासना।
जीवन स्वप्न है स्वप्न वासना।
अपने को क्या स्वप्न कल्पना।
सपने से सपना है अपना।
इस विचार को तोल।
मैना!जग उपवन में डोल।।
मैना-इस भ्रम में मत बन मतवाला ।
यह तन अमर प्रेम का प्याला ।
जिसमें सब स्वरूप रस डाला ।
तू रस का है पीने वाला ।
विष का बिंदु न घोल ।
रे मन तोता हरि हरि बोल।।
जोगड़ा होना आसान है जोगी होना कठिन है पलटू दास जी कहते हैं
पलटू जे संजम करै, करै रूप से भोग।
रण का चढ़ना सहज है ,मुश्किल करना जोग।।
आइए अब थोड़ा सिद्ध की बात कर लेते हैं सदगुरु श्री स्वामी
धर्मात्मानंद जी महाराज परमहंस कहते हैं "
दूसरे कऽ सिद्धि कय दिन काम देही?"
सद्गुरु की सयानी सीख में भी स्पष्ट कहते हैं" हम सिद्ध हईं
तऽ तोहके का ?तुम्हारी आत्म-सिद्धि ;तुम्हारा आत्मसाक्षात्कार ही तुमको काम
आएगा !किसी दूसरे का नहीं! दूसरे की सिद्धि उसके काम आएगी ;तुम्हारे
नहीं!"
कबीर ने सहज विश्रांति अथवा परम कैवल्य को सिद्धा वस्था कहा है
गोरख सोई ज्ञान गमि गहै।
महादेव सोई मन की लहै।।
सिद्ध सोई जो साधै इति।
नाथ सोई जो त्रिभुवन जती।।
इतना ही नहीं वह आगे कहते हैं
आपा भजबा सतगुरु खोजीबा जोग पंथ न करबा हेला ।।फिरी फिरी मनीषा
जन्म ना पाई बा करीला सिद्ध पुरुष सूँ मेला।।
जोग जुक्त जब पाओ ज्ञान ।
काया खोजो पद निर्वाण।।
जोगी सो जो राखै जोग।जिभ्या इन्द्री करै न भोग
अंजन छांड़ि निरंजन रहै।ताकू गोरख जोगी कहै।।
ब्यंद ही जोग ब्यंद ही भोग।ब्यंद ही हरै चौंसठि रोग।
या बिंद का कोई जानै भेव।सो आपै करता आपै देव।।
बिंद कऽ हाल गोबिंद न जानैं।
इस जनश्रुति का आधार गोरख बानी है न कि जतिद्वेष!
धन जोबन की करै न आस,चित्त न राखै कामिनि पास।
नाद बिंद जाके घट जरे,ताकी सेवा पारबती करै।।
और अन्त में-
कहैं कबीर एक मुंगरी गढ़ावा।
जे जैसे मानै ओके वैसे मनावा।।
हमने जो कहानी सुनी थी उसमें भाई ज़ोगी होकर बहुत दिनों बाद घर
लौटता है। दूसरा भाई सम्पत्ति में हिस्सा लेंगे ऐसा सोचकर सम्मान नहीं करता।कुछ
दिन बाद एक दूसरा जोगी गांव में आता है। यही भाई जो अपने जोगी भाई का कुशल
क्षेम भी नहीं पूछता उस जोगी की खूब आवभगत करता है। आवभगत शब्द ही भगत की
स्पेशल ट्रीट के लोकाचार से बना है।
जब घर आया जोगी उस जोगी से मिलने पहुंचा तो पता चला कि वह तो इसका ही
शिष्य है।
तभी से यह कहावत है
घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध।





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