प्रेम जब अनन्त से हों गया
रोम रोम संत हो गया।
देवालय बन गया यह बदन
हृदय तो महन्त हो गया।
तात भरत तुम सब विधि साधू।
राम चरन तव प्रीति अगाधू।।
अपने राम के चरण कमलों में जिसका अगाध अथाह प्रेम है,वह हर प्रकार से साधु ही है।
संत सरल चित् जगत हित,ये दोनों बातें जिसमें हैं पहला निर्मल मन और दूसरा जगत के कल्याण की भावना वह संत हैं।
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।
दरिया लच्छन साधु का,का गिरही का भेष।
निरपक्षी निर्द्वंद्व रह बाहर भीतर एक।। संत स्वभाव है,स्टेट आफ माइंड है, चित्त की दशा है।
संत न छोड़ै संतई,कोटिक मिलैं असंत।
मलय भुजंगहि बेधिया, शीतलता न तजंत।।
तब कहते हैं कि "संत कऽ हाल भगवंत न जानैं।।"
तब कहते हैं कि" सांतव सम मोहि मय जग देखा।मोतें अधिक संत करि लेखा।।"
आज कल का हाल है"जिसके संग दस पाँच हैं तिनका नाम महंत।।"


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