राजकुमार ने बाई जी से चुनने को कहा तो उन्होंने कहा यह तो मालिक न बताएंगे कि मैं कैसे बताऊं? मैंने कहा आप मेरा, राजकुमार या किसी अन्य का का नाम नहीं ले सकतीं यहां तक तो ठीक है लेकिन आप पूछने पर अपना नाम तो आगे कर सकती थीं? उन्होंने कवई काटते हुए कहा मैं देना चाह कर भी क्या करूंगी लेने वाला स्वीकार करेगा तब न! मैंने कहा यह तो बाद की बात है पहले आपको अपना नाम तो आगे करना चाहिए था। उन्होंने कहा यह बात पहले ही हो चुकी है उनका इशारा था कि महाराज जी उनके नाम का प्रस्ताव रिजेक्ट कर चुके हैं।
फिर उन्होंने कहा एक गाना में कहते हैं न कि
वक्त आने दे तुझे,,,,,,,,,,,,हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है,,,,,,,,,,, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।
मैं विस्मिल की पंक्तियां दुहराता हूं
इस ठसक से कहा कि उनका अति आत्मविश्वास अहं की सीमा को छूता हुआ अनुभव हुआ।
इस पूरी कवायद में एक सोची समझी रणनीति की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
मैंने राजकुमार से पूछा कि महाराज जी परीक्षा लेना चाहें तो उनका अधिकार है उस पर कोई बस नहीं लेकिन आप क्यों भक्तों की परीक्षा लेना चाहते हैं? उन्होंने कहा मैं परीक्षा नहीं ले रहा हूं मैं चाहता हूं कि अब जब महाराज जी दिल्ली जायं तो पांच लोग मेरे पीछे रहें ताकि जरूरत पड़ने पर वह तन मन से उपलब्ध रहें।
तो गुरु भाइयों और बहनों वक्त की नजाकत को समझते हुए तैयार रहें।

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